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हिंदी एक बहती नदी


कलमकार का आयोजन : मीडिया और भाषा
साहित्य अकादमी सभागार, नयी दिल्ली, 23 फरवरी, 2013

दिल्ली के साहित्य अकादमी सभागार में अखबार और न्यूज चैनल के संपादकों के साथ कलमकार फाउंडेशन ने मीडिया और भाषा विषय पर एक गहन चर्चा करवाई । आजतक के पूर्व न्यूज डायरेक्टर कमर वहीद नकवी ने हिंदी भाषा को एक बहती हुई नदी करार दिया और कहा कि किसी भी तरह के बंधन या मानक से उसको बांधने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए । नकवी ने कहा कि मीडिया की भाषा क्या और कैसी हो यह एक बेहद विवादास्पद विषय है जिसपर एकराय बनाना मुश्किल है । नकवी ने कहा कि एक परिवार में ही अलग अलग भाषा होती है । पिता का बच्चों के साथ संवाद और मां का बच्चों के साथ संवाद -दोनों की भाषा अलग होती है । मीडिया में काम करनेवालों को दर्शकों या पाठकों के साथ एक रिश्ता बनाना होता है । प्रिंट का पाठकों के् साथ एक औपचारिक संबंघ होता है । रेडियो का अंतरंग और टेलीविजन का बेहद अंतरंग होता है । लिहाजा तीनों माध्यमों की भाषा अलग अलग होती है और होनी भी चाहिए । नकवी ने जोर देकर कहा कि 1995 के बाद मीडिया की भाषा काफी बदली और अब वक्त आ गया है कि भाषा पर एकबार फिर से विचार होना चाहिए । हलांकि नकवी ने कहा कि भाषा का विकास का गलत बोलने वालों की वजहों से भी होता है । उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि पौधारोपण और चौड़ीकरण दोनों शब्द गलत हैं लेकिन प्रचलन में होने की वजह से लोग धड़ल्ले से उसका इस्तेमाल करते हैं और अब ये हिंदी का शब्द है । उनके मुताबिक बोलने और लिखने में भेद करने की जरूरत है लेकिन उन्होंने हिंदी को किसी दायरे में बांधने का विरोध करते हुए कहा कि हिंदी का दायरा काफी बड़ा है और वो बहुत उदार भी है । नेशनल दुनिया के प्रधान संपादक आलोक मेहता ने कहा कि कुछ हिंदी के शब्द ऐसे हैं जो वृह्ततर पाठक वर्ग की समझ में नहीं आते हैं । उन्होंने कहा कि जब वो बिहार के एक अखबार के संपादक बने तो वहां की भाषा में जिलाधिकारी को समाहर्ता कहा जाता था जो उनकी समझ में नहीं आया । राष्ट्रीय अखबार होने की वजह से इस तरह के शब्दों को बदलने की जरूरत होती है । आलोक मेहता ने कहा कि हिंदी इतनी कमजोर नहीं है कि उसको दूसरी भाषा के चंद शब्द भ्रष्ट कर दें।

इस सेमिनार में बोलते हुए आजतक के एक्जीक्यूटिव एडिटर अमिताभ ने कहा कि टीवी में भाषा के विस्तार की गुंजाइश नहीं है । हलांकि उन्होंने कहा कि टीवी में काम करनेवालों को अपनी सोच बदलने की जरूरत है और हिंदी के कठिन शब्दों की बजाए आसान शब्दों को लिखने की सोच को बढ़ाने की जरूरत है । हिंदी के कई शब्दों को इसेतामाल करने में तकनीक भी बाधा बनती है, लिहाजा हमें उस दिशा में भी विचार करना होगा । अमिताभ ने इस बात पर चिंता जताई आज न्यूजरूम में भाषा पर कभी चर्चा नहीं होती । भाषा का मसला हमेशा गौण रहता है । अमिताभ ने इस बात पर जोर दिया कि न्यूज चैनलों में भाषा पर विमर्श की शुरुआत होनी चाहिए । अमिताभ ने भाषा पर आयोजित इस सेमिनार के लिए कलमकार की सराहना भी की । वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने टीवी चैनलों पर जोरदार निशाना साधते हुए कहा कि वहां काम कर रहे कई पत्रकार हर रोज भाषा के साथ बलात्कार कर रहे हैं और उनकी हत्या कर रहे हैं । उन्होंने कहा कि पत्रकार भाषा निर्माता होता है और उसको अपनी इस भूमिका को सही तरीके से निभाना चाहिए । राहुल देव के मुताबिक हिंदी भाषा के होने का शर्म बहुधा हमें भाषा द्रोह तक लेकर जाती है जो बेहद चिंताजनक है ।

इस चर्चा में भाग लेते हुए आईबीएन7 के मैनेजिंग एडिटर आशुतोष ने बेहद आक्रामक अंदाज में हिंदी के मानकीकरण का विरोध किया । उन्होंने हिंदी में अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग के विरोध करनेवालों को आड़े हाथों लेते हुए गुलजार के लोकप्रिय गीत कजरारे कजरारे का हवाला दिया जहां गुलजार लिखते हैं- पर्सनल से सवाल करती है । उन्होंने कहा कि जिस दिन हिंदी शुद्ध हो जाएगी उस दिन वो मर जाएगी, अगर संस्कृत निष्ठ शब्दों से बांध देंगे तो बुरा हाल हो जाएगा । आशुतोष ने सवाल उठाया कि हिंदी में अंग्रेजी के शब्दों का विरोध है तो फिर मैथिली, अवधी. उर्दू के शब्दों का विरोध क्यों नहीं होता है । आशुतोष का कहना था कि अंग्रेजी के लोग आज हिंदी को बढ़ा रहे हैं चाहे वो फरहान अख्तर हों, जोया हों या काई पो चे के निर्माता । आशुतोष ने जोर देकर कहा कि हिंदी की जितनी सेवा टेलीविजन ने की है उतनी साहित्य ने नहीं की । वरिष्ठ पत्रकार राकेश शुक्ला ने केदारनाथ सिंह की कविता शब्द के हवाले से अपनी बात रखी । इस सेमिनार में केंद्रीय हिंदी निदेशालय के पूर्व अध्यक्ष गंगा प्रसाद विमल, वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री ने भी हस्तक्षेप किया । इस सेमिनार का संचालन वरिष्ठ पत्रकार तसलीम खान ने किया और धन्यवाद ज्ञापन अनंत विजय ने किया । कलमकार के इस सेमिनार में पत्रकारिता के छात्रों के अलावा दिल्ली के बुद्धिजीवियों ने भी हिस्सा लिया ।



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